तीर्थराज श्री कपाल मोचन – प्राचीन तपोस्थली और आस्था का केंद्र

kapal mochan teerath Gau Vacha Temple Yamunanagar Hulchul

Yamunanagar – श्री कपाल मोचन-श्री आदि बद्री मेला 1 नवम्बर से 5 नवम्बर 2025 तक

  • भगवान शंकर, श्रीराम और श्रीकृष्ण से जुड़ा पौराणिक इतिहास — ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति का स्थान

  • गुरु गोबिंद सिंह जी का 52 दिन का प्रवास — हिन्दू-सिख एकता का प्रतीक स्थल

  • कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाला राज्य स्तरीय मेला — लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र

Kapal Mochan Teerath – हरियाणा की धरती आदि काल से ही ऋषि-मुनियों की साधना एवं तप स्थली रही है। महर्षि दुर्वासा, महर्षि जमदग्रि, महर्षि भृगु, महर्षि च्यवन, महार्षि उद्ïदालक, महर्षि पिप्पलाद, महामुनि मयंक्शाक, महामुनि कपिल एवं महर्षि कृष्णा द्वैपायन आदि के आश्रम इसी प्रदेश में थे। वैदिक संस्कृति का उन्मेशस्थल ब्रहमवर्त (कुरूक्षेत्र) हरियाणा प्रदेश की दो देव नदियों सरस्वती एवं दृषद्ïवती के अन्तराल में ही स्थित था।

ब्रहमवर्त में ही चैत्ररथ नाम का वह वन था, जिसका वर्णन महाभारत में भी मौजूद था। इसी के समीप सरस्वती के दूसरे किनारे पर औशनस नाम का सुप्रसिद्घ तीर्थ था। कपाल मोचन के नाम से  प्रसिद्घ औशनस नामक इस तीर्थ में शुक्राचार्य ने तप किया था। शुक्राचार्य का नाम उशनस था। अत: यह स्थान उन्हीं की तपस्थली के नाम से अर्थात औशनस नाम से विख्यात हो गया। स्कन्ध महापुराण के अनुसार औशनस तीर्थ अर्थात कपाल मोचन द्वैतवन में स्थित था। द्वैतवन, जिसमें बद्री और सिंधु नाम के दो उपवन थे, पवित्र सरस्वती और यमुना नदी के मध्यवर्ती प्रदेश में स्थित था।

आदि काल में ब्रहमा जी ने इसी द्वैतवन में यज्ञ किया था, जिसमें सभी देवी-देवताओं एवं ऋषि-मुनियों ने भाग लिया था। ब्रह्मï जी ने पदम काल में यज्ञ करवाने के लिए तीन हवन कुण्ड बनवाए थे, जो प्लक्ष, सोम सरोवर व ऋण मोचन के नाम से प्रसिद्घ हैं। यज्ञ के दौरान एक ब्राह्मïण का लडक़ा ऋषि-मुनियों की सेवा किया करता था। यज्ञ के पश्चात ब्रहमा जी ब्रहमलोक चले गए तथा ऋषियों-मुनियों ने भी अपने-अपने गंतव्य स्थान पर जाने की तैयारी कर ली। ऋषियों-मुनियों ने ब्राहमण के लडक़े से कहा कि उनके स्नान हेतु सरस्वती नदी से पवित्र जल ले आओ। लडक़े ने जल लाने में आना-कानी की जिसे ऋषियों-मुनियों ने भांप लिया।

ऋषियों-मुनियों के श्राप के डर से वह सरस्वती नदी से स्नान हेतु जल लेने चला गया तथा वह वहां से काफी देर में लौटकर आया। तब तक ऋषियों-मुनियों ने अपने गन्तव्य स्थान पर जाने की तैयारी कर ली थी। उन्होंने वह जल उस ब्राह्मïण के लडक़े के ऊपर दे मारा। उसमें से कुछ जल यज्ञ हवन कुण्ड में गिर गया। देरी से आने के कारण ऋषियों-मुनियों ने ब्राह्मïण के लडक़े को श्राप दिया कि तूं कभी गाय के पेट से जन्म लेगा तथा कभी ब्राह्मïण के रूप में। लडक़े ने ऋषियों-मुनियों से पूछा कि हे मुनियों तब मेरा उद्घार कैसे होगा। ऋषियों-मुनियों ने कहा कि हवन कुण्ड में पड़ा जल ही तेरा सातवें जन्म में गाय के पेट से पैदा होने के बाद उद्घार करेगा। यज्ञ हवन कुण्ड में ऋषियों द्वारा फैंके गए जल में अमृत उत्पन्न हुआ और ऋषियों-मुनियों ने इसका नाम सोमसर रखा।

समय बीतता गया और द्वैतवन में ही वह लडक़ा कभी ब्राह्मण के घर तथा कभी उस ब्राह्मïण की गाय के पेट से पैदा होता रहा। इसी दौरान कलयुग के प्रभाव के कारण ब्रह्मा अपनी पुत्री सरस्वती के प्रति मन में बुरे विचार रखने लगा, जिससे बचने के लिए सरस्वती ने द्वैतवन में शंकर भगवान से शरण मांगी। सरस्वती की रक्षा के लिए शंकर भगवान ने ब्रह्मा का सिर काट दिया, जिससे भगवान शंकर को ब्रहम हत्या का पाप लगा। इससे शंकर भगवान को ब्रहम कपाली का दोष लगा। सब तीर्थो में स्नान व दान इत्यादि करने से भी वह चिन्ह दूर नहीं हुआ।

घूमते-घूमते शंकर भगवान पार्वती सहित सोमसर तालाब के निकट देव शर्मा नामक ब्राह्मïण के घर ठहरे। शंकर भगवान तो समाधि में लीन हो गए, परन्तु माता पार्वती को उनके ऊपर लगे ब्रहम हत्या दोष की वजह से नींद नहीं आ रही थी। रात्रि के समय गाय का बछड़ा अपनी माता को कहता है कि *हे माता, सुबह यह ब्राह्मण मुझे बधिया करेगा, उस समय मैं उसकी हत्या कर दूंगा । गाय माता ने कहा कि *हे बेटा, ऐसा करने से तुझे ब्रहम-हत्या का दोष लग जाएगा। बछड़े ने कहा कि माता मुझे ब्रह्महत्या के दोष से छुटकारा पाने का उपाय आता है। गाय और बछड़े की सारी बातें पार्वती माता ने ध्यानपूर्वक सुनी।

सुबह होने पर ब्राह्मण ने बछड़े को बधिया करने का कार्य शुरू किया। इसी दौरान बछड़े ने उस ब्राह्मण की हत्या कर दी, जिससे उसे ब्रहम हत्या का घोर पाप लगा तथा बछड़े व गाय का रंग काला पड़ गया। इससे गाय बहुत दुखी हुई। बछड़े ने माता को कहा कि हे माता आप जल्दी से मेरे पीछे-पीछे आओ। गाय और बछड़े ने सोमसर अर्थात औशनस तालाब में पश्चिम दिशा से प्रवेश किया तथा पूर्व दिशा में निकल गए तथा उनका रंग पुन: सफेद हो गया, केवल पांव कीचड़ में तथा सींग पानी से ऊपर रहने के कारण उनका रंग काला ही रह गया। इस सारे दृश्य को भगवान शंकर और माता पार्वती ने देखा।

माता पार्वती ने शंकर भगवान से कहा कि इस तालाब में स्नान करने से आपका ब्रहम-हत्या का दोष भी अवश्य ही दूर हो जाएगा। भगवान शंकर ने तालाब में स्नान किया, जिससे उनका ब्रहम कपाली का दोष दूर हो गया। इसके उपरांत उन्होंने सरोवर के पूर्वी तट पर आकर गाय व बछड़े को दर्शन दिए। भगवान शंकर और पार्वती  के दर्शन से उनका उद्धार हो गया और उन्हें बैकुण्ठ की प्राप्ति हुई। सरोवर के पश्चिमी तट पर राम आश्रम घाट के नजदीक आज भी गाय और बछड़े की कालें रंग की तथा पूर्वी तट पर प्राचीन मंदिर में गाय व बछड़े की सफेद रंग की प्रतिमाएं स्थापित है। इस प्रकार भगवान शंकर के ब्रहम हत्या के कपाली दोष से छुटकारा मिलने के कारण इस सोम सरोवर का नाम कपाल मोचन हो गया।

वर्तमान कपाल मोचन तीर्थ का नाम औशनस तीर्थ था, जिसका वर्णन महाभारत और वामन महापुराण में मौजूद है। इन महापुराणों के अनुसार भगवान श्रीराम चन्द्र जिस समय दण्डकारण्य में गए तो उन्होंने वहां के एक दुरात्मा राक्षस का सिर अपने तीव्र धार वाले वाण से काट दिया। वह राक्षस तो मर गया, किन्तु उसका कटा हुआ सिर दूर जाकर महोदर नाम के एक तपस्वी मुनि की जंघा से चिपक गया। इस कौतुक को देखकर मुनि बहुत हैरान हुए। कुछ दिनों बाद उनकी जंघा में गंधपूर्ण स्राव होने लगा, जिससे वे बहुत दुखी हो गए। उनके इस प्रकार संकट-ग्रस्त होने की सूचना जब अन्य ऋषि-मुनियों को मिली तो वे एकत्रित होकर उनके पास गए। महोदर मुनि की दशा को देखकर वे भी बहुत चिन्ता करने लगे। उसी समय किसी ऋषि ने महोदर मुनि को औशनस तीर्थ की यात्रा करने व यहां स्नान करने को कहा।

उस समय समस्त भारत में औशनस ही एक ऐसा तीर्थ था, जहां स्नान करने से इस संकट से छुटकारा मिल सकता था। ऋषियों के कहने के अनुसार महोदर मुनि जैसे-तैसे दण्डकारण्य से चलकर सरस्वती नदी के तट पर द्वैतवन में पहुंचे, वहां जाकर उन्होंने ज्यो ही सरोवर में स्नान किया, त्यों ही राक्षस का कटा हुआ सिर उनकी जंघा से छूटकर जल में गिरकर गायब हो गया। इस घटना की सूचना उन ऋषियों को मिली, जिन्होंने उन्हें औशनस तीर्थ की यात्रा करने की सलाह दी थी तो वे भी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने ही औशनस तीर्थ को कपाल मोचन नाम दिया और तब से यह तीर्थ कपाल मोचन के नाम से सर्व लोक में प्रसिद्ध हो गया। जिस प्रकार कांशी को वाराणसी भी कहते है, उसी प्रकार औशनस को कपाल मोचन भी कहा जाने लगा। शनै: शनै: औशनस नाम तो लुप्त होता चला गया और इसे अब कपाल मोचन के नाम से ही जाना जाने लगा है।

त्रेता युग में भगवान रामचन्द्र ने रावण का वध किया, जो सभी वेद शास्त्रों के ज्ञाता होने के साथ-साथ ब्राह्मïण भी थे। इस कारण उन्हें ब्रहम-हत्या का दोष लगा था। इसके उपरांत यहां कपाल मोचन तीर्थ में भगवान रामचन्द्र ने स्नान  किया तथा ब्रहम हत्या दोष से मुक्ति पाई। द्वापर युग में महाभारत के युद्घ के पश्चात भगवान श्री कृष्ण, पाण्डवों एवं बलराम के साथ यहां आए। पाण्डवों को पितृ ऋण से मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने कपाल मोचन एवं ऋण मोचन सरोवर में स्नान किया। गार्गी गोत्र के दो तपस्वी ब्राहमणों की हत्या करने से इन्द्र देव को भी ब्रहम हत्या का दोष लगा।

अपने गुरू बृहस्पति के बताने पर इन्द्र देव ने भी इस पवित्र तीर्थ में स्नान कर ब्रहम हत्या के दोष से छुटकारा पाया। स्कन्द पुराण के अनुसार कपाल मोचन तीर्थ बहुत प्राचीन और ब्रहम-हत्या नाशक, संतान, धन प्राप्ति आदि सब कामनाएं पूरी करने वाला तीर्थ है। इस तीर्थ में स्नान करने से राजा श्रुत के यहां पुत्र पैदा हुआ, जिसका वर्णन स्कन्द पुराण, हिमादिखण्ड, सिन्धु पर्वत के बद्रीवन में स्थित कपाल मोचन महातम्य वर्णन नाम के छठे अध्याय में मिलता है।

सिक्खों के दशम गुरू श्री गोबिन्द सिंह भंगानी युद्घ के बाद यहां 52 दिन रूके। उन्होंने ऋण मोचन और कपाल मोचन में स्नान किया और अपने अस्त्र-शस्त्र धोए। कपाल मोचन और ऋण मोचन तीर्थो के बीच एक प्राचीन अष्टकौण गुरूद्वारा है। उन्होंने कार्तिक पूर्णिमा के दिन गुरू नानक देव के पर्व  गुरू पर्व को मानने वालों की सारी कामनाएं पूरी होने का वरदान दिया, जिस कारण आज तक इस अवसर पर यहां लाखों गुरू भक्त आकर गुरूपर्व मनाते है। गुरू गोबिन्द सिंह ने कपाल मोचन के महन्त को हस्त लिखित पट्ïटा और ताम्र पत्र दिया, जो आज भी मौजूद है। मेला कपाल मोचन में अधिकांश श्रद्वालू पंजाब से आते हैं इसलिए इस मेले को हिन्दू-सिक्ख एकता का प्रतीक भी कहा जाता है।

दन्त कथाओं के अनुसार भगवान श्री राम चन्द्र रावण का वध करने के पश्चात माता सीता व लक्ष्मण सहित पुष्पक विमान द्वारा कपाल मोचन सरोवर में स्नान करके ब्रहम हत्या के दोष से मुक्त हुए और जहां पर वह ठहरे थे, वहां उन्होंने एक कुण्ड का निर्माण करवाया, जिसे  आज सूरज कुण्ड के नाम से जाना जाता है। एक अन्य जनश्रुति के अनुसार सिन्धु वन के इस पवित्र स्थान पर माता कुन्ती ने सूर्य देव की तपस्या की, जिसके कारण उन्हें कर्ण नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। श्री कृष्ण पाण्डवों सहित महाभारत के युद्घ के पश्चात यहां आए और सूरज कुण्ड सरोवर में स्नान किया।

हरियाणा के प्राचीन सिन्धुवन क्षेत्र में स्थित इस पवित्र स्थल पर कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर एक राज्य स्तरीय मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें उत्तर भारत के अनेक राज्यों जैसे हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, केन्द्र शासित प्रदेश चण्डीगढ़ इत्यादि से लाखों की संख्या में भिन्न-भिन्न धर्मों के श्रद्धालु भाग लेते है और अपनी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए इस पवित्र स्थल पर स्नान करके तीनों लोकों के पापों से मुक्ति प्राप्त करते हैं।


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