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ब्रहमज्ञान के अनुसार जीवन जीने वाला ही सच्चा गुरसिक्ख : जय कुमार नारंग

यमुनानगर। संत निरंकारी सत्संग भवन में साप्ताहिक सत्संग का आयोजन किया गया,जिसकी शुरूआत पावन अवतारवाणी के शब्द गायन से हुई। सत्संग की अध्यक्षता जय कुमार नारंग जी व मंच संचालन भगवान दास जी ने किया।
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साध संगत को सम्बोधित करते हएु श्री नारंग जी ने कहा कि सृष्टि में जिसकी जिस काम के लिए रचना की गई है वह वहीं कार्य कर रहा है केवल मनुष्य भटक गया है, तभी  मनुष्य को मनुष्य बनने के लिए कहा जाता है। उन्होंने कहा कि मानव सुखों के पीछे भागता है लेकिन सुख कीते ना मिलदा जी सुख गुरू दी शरनी, ब्रहमज्ञान की प्राप्ति के बाद हमें यह बोध हो जाता है कि कर्ता हम नही कर्ता तो स्वयं यह निरंकार है। हमें अहसास हो जाता है कि हम इस निरंकार दातार की गोद में है। सतगुरू हमें मिठा बोलना सिखा रहे है और जग की शोभा वो बनते गुरू वचनों को जो अपनाते। गुरू के आदेशों को जीवन में अपनाना ही भक्ति है।
उन्होंने कहा कि हम सत्संग में आए तो हमारा ध्यान सत्संग में ही होना चाहिए और जो भी हम सत्संग में सुने उसे जीवन में उतारना  चाहिए। उन्होंने बताया कि किसी सज्जन ने उनसे पूछा कि आपके मिशन में कहा जाता है कि गुनाहो के बदले सजाए माफी, ये  मुर्शद का दर है अदालत नही है क्या यह बात सच है तो उन्होंने बताया कि यह सच है कि ब्रहमज्ञान लेने से पहले के गुनाह माफ हो जाते है लेकिन ब्रहमज्ञान लेने के बाद गुनाह करते हुए इंसान को डर लगता है। उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि जैसे एक ट्रेफिक पुलिस वाला चौक पर खड़ा होकर सबको सिग्नल के अनुसार चलने के लिए कहता है पंरतु यदि वह स्वयं सिग्नल तोड़े तो उसका भी चालान काटा जाता है। इसी तरह ज्ञान लेने के उपरांत ज्ञान के अनुसार ही जीवन जीना ही गुरसिक्खी है। इस अवसर पर अनेक वक्ताआंे ने अपने विचारों, गीतों व कविताओं के माध्यम से मिशन का सत्य संदेश दिया व भारी संख्या में श्रद्धालुओं ने सत्संग में भाग लिया।

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